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(रायपुर साहित्य सम्मेलन): संतन को तो सीकरी से ही काम

मुकेश कुमार। जब सब भोपाल जा रहे थे तब मै भोपाल नहीं गया। वहाँ दरबारी संस्कृति की चकाचौंध थी और गैस त्रासदी का गहन अंधकार भी। मैं कैसे शामिल हो सकता था ऐसे उत्सवों में? जब सब रायपुर जा रहे थे, मैं रायपुर भी नहीं गया। एक फासीवादी सरकार के आयोजन में शिरकत करके मैं कैसे उसे वैधता प्रदान कर सकता था? मैं बनारस भी नहीं गया। वहाँ भी न जाने के पीछे वही तर्क और विवशता थी।
(रायपुर साहित्य सम्मेलन): संतन को तो सीकरी से ही काम
मुकेश कुमार। जब सब भोपाल जा रहे थे तब मै भोपाल नहीं गया। वहाँ दरबारी संस्कृति की चकाचौंध थी और गैस त्रासदी का गहन अंधकार भी। मैं कैसे शामिल हो सकता था ऐसे उत्सवों में?

जब सब रायपुर जा रहे थे, मैं रायपुर भी नहीं गया। एक फासीवादी सरकार के आयोजन में शिरकत करके मैं कैसे उसे वैधता प्रदान कर सकता था? मैं बनारस भी नहीं गया। वहाँ भी न जाने के पीछे वही तर्क और विवशता थी।

मैं लखनऊ भी नहीं गया। वहाँ जाना उस सरकार के साथ निकटता दिखाना होता जो कुशासन, जातिवाद और भ्रष्टाचार की पर्याय बन चुकी है। इसके पहले मैं अहमदाबाद भी नहीं गया था क्योंकि जिस सरकार का दामन निर्दोषों के ख़ून से रंगा हो वहाँ जाना लेखकीय तो छोड़िए इंसानियत के ही विरुद्ध था। कुछ वैचारिक दुविधाओं की वजह से मैं पटना नहीं गया, मैं कोलकाता नहीं गया, मुंबई, गोवा, चेन्नै, हैदराबाद और गुवाहाटी कहीं भी नहीं गया। मैं धन्ना सेठों के कार्यक्रमों में कभी-कभार चला गया, क्योंकि मजबूरी थी। उसके बिना पत्र-पत्रिकाओं में छपना और पुरस्कार मिलना संभव नहीं था। कुछ लोग कहते हैं मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी। मैं कहता हूँ ज़रूरी का नाम महात्मा गाँधी, क्योंकि नोट पर वही छपे होते हैं।

कई सरकारी कार्यक्रमों में भी इसी रणनीति की वजह से आता-जाता रहा। वैसे सुविधानुसार मैं इस तर्क का इस्तेमाल कर लेता हूँ कि लोकतंत्र में सरकार तो पब्लिक के पैसे से ही चलती है, इसलिए वहाँ जाने में ग़लत क्या है।


हमारे कुछ साथियों को पत्र-पत्रिकाएं चलाने के लिए उन सरकारों पर भी निर्भर रहना होता है, जिनसे वे पूरी तरह असहमत होते हैं। लेकिन क्या करें वे भी सरकार के कृपा-पात्र बने रहने के लिए मजबूर हैं। उनका ये तर्क मानना पड़ता है कि वे विज्ञापन लेते हैं लेकिन स्वतंत्र रूप से काम भी करते हैं। इसमें मुझे कोई विरोधाभास नहीं दिखता।
मैं वर्धा चला गया क्योंकि वहाँ अपने जैसे लोग थे और फ्लाइट का टिकट भी मिला था। साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए मैंने विश्व हिंदी सम्मेलनों, और लंदन, पेरिस, न्यूयार्क की यात्राएं कीं। बाहर जहाँ से भी न्योता मिला चला गया क्योंकि एक लेखक के लिए अपनी भाषा और साहित्य का दुनिया में झंडा फहराना ज़रूरी होता है और मैं भाषा-भक्ति की इस होड़ में पीछे नहीं दिखना चाहता था।
हालाँकि किसी को कोई ग़लतफ़हमी न रहे इसलिए स्पष्ट कर दूँ कि मैं विदर्भ में किसानों की आत्महत्या की वजह जानने के लिए भी जाना चाहता था मगर कोई संयोग ही नहीं बन पाया। शायद ऐसा ही कुछ गुड़गाँव की फैक्ट्री में हड़ताल के समय भी हुआ था।
आप मेरी मजबूरी समझिए। आख़िर मैं अपना अनमोल साहित्य लेकर कहाँ जाऊँ। इनके अलावा कोई मुझे बुलाता ही नहीं। मैं बरेली, घुनघुटी, बेगूसराय, धुबुड़ी, भिंड, झुमरी तलैया वगैरा भी जाना चाहता था, मगर किसी ने बुलाया ही नहीं। कभी बुलाया भी तो स्लीपर क्लास का टिकट देकर, जिसमें सफर करना मेरी आदत नहीं रही। कैसे जाऊं, वे तो ठहराने और पत्रम्-पुष्पम् का भी ठीक से इंतज़ाम नहीं करते।
सच ये है कि मैं तो गाँव-देहात ही जाना चाहता हूँ, क्योंकि लिखता तो मैं उन्हीं के लिए हूँ। मजदूरों को ही कथा-कविता सुनाना चाहता हूँ। लेकिन फिर खयाल आता है कि खेत-खलिहान और खदान के अनपढ़-गँवार भला उसे समझ पाएंगे? मजदूरों को भला क्या पता कि कविता किस चिड़िया का नाम है? वे तो शाम से ही दारू पीकर मस्त हो जाते हैं।
अब देखिए, ये सरासर ज़्यादती है कि आप सारी ज़िम्मेदारी लेखक पर ही डाल देते हैं। आख़िर समाज को भी तो कुछ करना चाहिए। उसे अपने लेखकों और कलाकारों का सम्मान नहीं करना चाहिए क्या? उसे तो लत लग गई है मंच पर स्वांग करने वाले कवियों को सुनने और वर्दी वाला गुंडा टाइप उपन्यासों को पढ़ने की।
असल में ये संस्कृति के महापतन का दौर है, इसमें अकेला लेखक क्या कर सकता है। आप ठीक कहते हैं सब मिलकर कुछ कर सकते हैं। लेकिन समस्या तो यहीं है न। आख़िर सब मिलें कैसे। सबके तो अपने-अपने मठ हैं और मठाधीशों की दिलचस्पी साहित्य और समाज में कम अपने लोगों को श्रेय और सम्मान दिलाने में ज़्यादा है।
आपको तो पता ही है ये मठ भी भाँति-भाँति के हैं। विचारधाराओं के भर होते तो मान लेते कि चलो ये विचारों की लड़ाई है और इससे तो समाज का भला ही होगा। लेकिन यहां तो जातियों के हिसाब से ठेके खुल हुए हैं। तुम ब्राम्हण, ठाकुर हो तो हमारे हो, तुम यादव, दलित हो तो उनके हो। ऐसे में गुणवत्ता तो चली जाती है तेल लेने। कैसे फलेगा-फूलेगा साहित्य? कौन पढ़ना चाहेगा घटिया रचनाएं? फिर हल्ला करते हैं पाठक नहीं है, पाठक नहीं है।



अब हम जानते हैं कि आप क्या पूछेंगे। पूछेंगे कि तो करें क्या? तो हम आपको बता दें कि इसका जवाब देने का ठेका हमने नहीं लिया है। जाइए उनके पास जो झंडा-डंडा लेकर खड़े रहते हैं हर समय और जब जवाब देने का समय आता है तो घुस जाते हैं बिलों में या हकलाने लगते हैं। साफ़-साफ़ बोलते नहीं बनता कि ये चलेगा और ये नहीं। हम तो राजधानी (चाहे वह देश की हो प्रदेश की या परदेश की) में रहकर साहित्य साधना कर रहे हैं करते रहेंगे। संतन को तो सीकरी से ही काम है। जनता के लिए बाज़ार है, वह वहीं जाए, खरीदे खाए।


अब आप प्रश्न करोगे लेखकीय स्वतंत्रता की तो वो तो हमारी समझ में नहीं आती। जिनके पास भोजन से रसरंजन तक का इंतज़ाम है वे लेखकीय स्वतंत्रता की बात करते हैं, लेकिन मौक़ा मिलते ही दूसरे की स्वतंत्रता को लील लेने के लिए तत्पर रहते हैं। यहाँ तक कि चरित्र-हनन तक करने से बाज नहीं आते।

दरअसल, ये जो हमारा लेखक समाज है न, वह बड़ा ही महापाखंडी है। वह गिरोहबंदी भी करता है और दूसरे यदि गिरोह बनाएं तो उनका विरोध भी। अपने आदमी को पुरस्कार मिले तो पुरस्कार का सम्मान बढ़ जाता है और दूसरे गिरोह के रचनाकार को तो पुरस्कार का अवमूल्यन हो जाता है। दोनों गिरोह लगे रहते हैं कि अकादमियों में अपने लोग बैठ जाएं और अपने लोगों को पुरस्कृत करें लेकिन ऐसा न हो पाए तो पक्षपात, स्वायत्ता जैसे सवाल खड़े करने लगते हैं।


हम तो भैये किनारे बैठके मज़े लेते हैं। अब देखें कहाँ का न्योता मिलता है और वहाँ कौन-कौन जाता है और कौन नहीं। अभी हम बताने की स्थिति में नहीं हैं कि हम खुद क्या करेंगे। क्या पता उस समय स्वास्थ्य अच्छा हो या खराब हो? कोई अपरिहार्य कारण भी उपस्थित हो सकता है, जाने, न जाने दोनों के लिए।

यदि आपके पास भी मीडिया जगत से संबंधित कोई समाचार या फिर आलेख हो तो हमें jansattaexp@gmail.com पर य़ा फिर फोन नंबर 9650258033 पर बता सकते हैं। हम आपकी पहचान हमेशा गुप्त रखेंगे। - संपादक

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