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आपातकाल और मीडिया

Mukesh Kumar। हर साल की तरह इमर्जेंसी को याद करने की रस्म अदायगी इस साल भी संपन्न की गई। इस बार भी ये कर्मकांड करते हुए वही चूक हुई जो हर बार होती है। आपातकाल को याद
आपातकाल और मीडिया
Mukesh Kumar। हर साल की तरह इमर्जेंसी को याद करने की रस्म अदायगी इस साल भी संपन्न की गई। इस बार भी ये कर्मकांड करते हुए वही चूक हुई जो हर बार होती है। आपातकाल को याद करते समय़ केवल मीडिया पर लगे प्रतिबंधों को याद किया गया। इमर्जेंसी के दौरान हुई दूसरी ज़्यादतियों का उल्लेख नहीं हुआ और अगर हुआ भी तो बहुत कम। ऐसा शायद इसलिए होता है कि मीडिया को अपने बारे में चर्चा करने में अतिरिक्त आनंद आता है और वह उसी में मगन हो जाता है। इमर्जेंसी के बारे में लिखने-सोचने वाले अधिकतर लोग पत्रकार ही होते हैं इसलिए ऐसा होना स्वाभाविक भी है। ये बात दीगर है कि इमर्जेंसी के दौरान मीडिया की भूमिका वैसी नहीं थी जिसे गर्व के साथ याद किया जाए। इस बहुचर्चित वाक्य को कौन भूल सकता है कि प्रेस से झुकने के लिए कहा गया और वह रेंगने लगा। यानी इमर्जेंसी स्वतंत्र भारत के इतिहास का एक बदनुमा दाग़ तो थी ही, मीडिया के लिए भी इक्कीस महीने का कालखंड एक शर्मनाक अध्याय था।




हम आपातकाल में मीडिया की भूमिका को यहाँ दोहराना नहीं चाहते और न ही उसको लेकर छाती पीटने का हमारा इरादा है। लेकिन इमर्जेंसी को याद करने का कोई तुक नहीं है अगर हम उसके परिप्रेक्ष्य में मीडिया की वर्तमान स्थिति को जाँचने-परखने के लिए तैयार नहीं हैं। ख़ास तौर पर इसलिए कि मीडिया के असीमित विस्तार के बीच उसकी साख, उसकी विश्सनीयता और उसकी उपादेयता को लेकर जब इतने सारे संदेह पैदा हो गए हों, तो उन्हें भुलाकर चालीस साल पहले की घटना को याद करने से क्या फ़ायदा? इससे न तो खुशी मिल सकती है न संतुष्टि। संतुष्ट तो तभी हुआ जा सकता है जब हम मीडिया के उन मूल्यों और सरोकारों को लेकर आश्वस्त हों जिन्हें लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार माना जाता है। लेकिन इस बारे में शायद ही कोई होगा जो पूरे यक़ीन के साथ कह सके कि मीडिया की वर्तमान भूमिका संतोषजनक है और अगर कोई कहता भी है तो मान लीजिए कि वह वास्तविकताओं से अनजान है।



मीडिया को न्यूज़ ट्रेडर, बाज़ारू, बिकाऊ और वेश्या के रूप में निरूपित करना इसकी ताज़ा मिसाल है। ये शब्द किसी ऐरे-गैरे नत्थू खैरे की ज़ुबान से नहीं निकले थे। देश के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्केंडेय काटजू ने इनका इस्तेमाल मीडिया के लिए किया था। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी सुपारी जर्नलिज्म का जुमला उछाला था। अपने इस कर्म पर इन लोगों ने कभी अफ़सोस ज़ाहिर नहीं किया, न ही अपने शब्दों को वापस लेने की उदारता ही दिखलाई। इससे पता चलता है कि उनकी निगाह में मीडिया और पत्रकारों की छवि क्या है। बेशक पत्रकारों को राजनीति के इस आईने में अपनी छवि नहीं देखनी चाहिए, क्योंकि वह विकृत है। लेकिन दुख की बात तो ये है कि उसकी यही छवि अब आम जनता के दिमाग़ों में भी घर कर गई है। उसने भी उसे सम्मान की निगाहों से देखना बंद कर दिया है। कहीं भी चार लोगों से मीडिया के बारे में बात कर लीजिए यही सुनने को मिलेगा कि मीडिया ग़ैर ज़िम्मेदार है, वह मुनाफ़ाखोरी में लगा है, उसके चरित्र का अधोपतन हो गया है, वगैरा, वगैरा। अगर जन धारणा ये है तो ये कहा जा सकता है कि मीडिया आपातकाल से गुज़र रहा है। मीडिया के इस आपातकाल को पूरी पत्रकारिता के कमज़ोर बल्कि असहाय होते जाने में भी देखा जा सकता है।
ये तो स्पष्ट है कि चाहे स्वेच्छा से हो या मजबूरी में, मीडिया ने अपना रास्ता तो बदल ही लिया है और इसी के साथ उसके वे सरोकार भी बदल गए हैं जो उसे जनता तथा लोकतंत्र के साथ जोड़ते हैं। इस हक़ीक़त को अस्वीकार करने का मतलब है कि हम उन ख़ौफ़नाक़ सचाईयों से मुँह मोड़ रहे हैं जो पिछले ढाई-तीन दशकों में देखते-देखते पूरे परिदृश्य पर छा गई हैं। ये सचाईयां भूमंडलीकरण एवं उदारीकरण की कोख से जन्मी हैं और उन्होंने पूरी अर्थव्यवस्था को ऐसे साँचे में ढाल दिया है जिसकी वजह से देश की राजनीति बदली है और मीडिया की भी चाल, चरित्र और चेहरा सब कुछ बदल गया है। ये बदलाव बहुत विस्तृत और गहरे हैं। ज़ाहिर है इनका असर भी उतना ही गहरा हुआ है। पहले राजनीति ने बाज़ारवादी व्यवस्था को आकार दिया, फिर बाज़ार ने सरकार को अपने हाथों मे ले लिया। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान मीडिया बाज़ार का साधन बना रहा और वह अब तो ज़्यादा मज़बूती से उसके साथ है।




एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया की भूमिका प्रहरी की होती है। वह संविधान प्रदत्त नागरिक स्वतंत्रताओं एवं अधिकारों की रखवाली करता है, उन्हें बढ़ावा देने का साधन बनता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इनमें से एक महत्वपूर्ण अधिकार माना जाता है और वह अधिकांश मौक़ों पर मीडिया के ज़रिए ही व्यक्त एवं पुष्ट होता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद लंबे समय तक मीडिया इस ज़िम्मेदारी का निर्वाह सीमित अर्थों में तो करता ही रहा है। एक तो स्वतंत्रता आंदोलन से उपजे मूल्यों की वजह से और दूसरे उसे राजनीतिक वातावरण भी कमोबेश अनुकूल मिला। लेकिन ये स्थिति लंबे समय तक नहीं बनी रह सकी। आपातकाल के दौरान बहुत सारी लोकतांत्रिक संस्थाओं पर कुठाराघात हुआ और मीडिया उनमें से एक था। इमर्जेंसी हटने के बाद एक बार फिर से उसने उठकर कमर कसने की कोशिश की, लेकिन उपभोक्ता संस्कृति के हमले ने उसे अपने उद्देश्यों से भटका दिया। अब सरकार के साथ-साथ बाज़ार भी उसे अपने हिसाब से चलाने के लिए हाज़िर हो चुका था। मीडिया को अगला झटका सन् 1991 में लागू की गई नवउदारवादी आर्थिक नीतियों से लगा। उनकी वजह से उसके चरित्र मे जो परिवर्तन शुरू हुए वे अभी तक जारी हैं। अब मीडिया को बड़ी पूँजी निगलने के लिए आतुर है। जैसा कि अमेरिका में हुआ, कुछ बड़ी कंपनियों का मीडिया के क्षेत्र में एकाधिकार होता दिख रहा है, जिससे मीडिया के लिए ख़तरा बढ़ जाएगा। इससे लोकतंत्र के लिए भी ख़तरा बढ़ेगा, क्योंकि विविधता और बहुलता उसकी सबसे बड़ी पहचान और ताक़त होती है।




इसलिए जब हम आपातकाल को याद करते हैं और नहीं चाहते कि देश को एक बार फिर से उस भीषण संकट से गुज़रना पड़े तो हमें मीडिया के बारे में नए तरीके से सोचना होगा। इतिहास को याद करने का एक ही उद्देश्य हो सकता है और वह है उससे सबक सीखे जाएं। हम सीखना भी चाहते हैं और सावधान भी रहना चाहते हैं, लेकिन मुश्किल ये है कि हमारा सोच पिछड़ा है। हम चालीस साल पहले के परिदृश्य में ही आपातकाल और मीडिया की पड़ताल करते हैं। नई परिस्थितियों में मीडिया और लोकतंत्र दोनों को ही सरकार से तो ख़तरा है ही, बाज़ार से भी ख़तरा है। इसलिए ज़रूरी है कि संगठित होकर उन मीडिया सुधारों और नियमन के लिए प्रयास किए जाएं जिनसे ये अघोषित आपातकाल वास्तविक आपातकाल में न तब्दील हो पाए। अगर ऐसा नहीं किया गया तो इस बार का भी हमारा रोना-धोना पिछले वर्षों की तरह कर्मकाँड बनकर रह जाएगा। उसका कुछ लाभ न मीडिया को होगा और न ही लोकतंत्र को।

यदि आपके पास भी मीडिया जगत से संबंधित कोई समाचार या फिर आलेख हो तो हमें jansattaexp@gmail.com पर य़ा फिर फोन नंबर 9650258033 पर बता सकते हैं। हम आपकी पहचान हमेशा गुप्त रखेंगे। - संपादक

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