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‘पेड न्यूज’ पर जवाबदेही तय हो

Sushil Upadhyay । सपाट शब्दों में कहें तो पेड न्यूज पाठकों के भरोसे के प्रति छल और कपटपूर्ण बर्ताव है। जिन लोगों ने भारतीय पत्रकारिता के आकार-ग्रहण करने में मदद की और उसे वर्तमान
‘पेड न्यूज’ पर जवाबदेही तय हो
Sushil Upadhyay । सपाट शब्दों में कहें तो पेड न्यूज पाठकों के भरोसे के प्रति छल और कपटपूर्ण बर्ताव है। जिन लोगों ने भारतीय पत्रकारिता के आकार-ग्रहण करने में मदद की और उसे वर्तमान स्तर तक पहुंचाया, पेड न्यूज उनके प्रति भी धोखा है। जैसा कि हम में से ज्यादातर लोग जानते हैं कि आजादी की लड़ाई के दौरान भाषायी पत्रकारिता ने काफी बड़ी चुनौतियों का सामना किया और न केवल प्रेस की आजादी, वरन देश की आजादी के लिए भी बड़ी कीमत चुकाई। इस संदर्भ में सोचकर देखिये कि पेड न्यूज अपने अतीत के साथ कोई रिश्ता बनाती दिखती है या नहीं! वास्तव में इसका अतीत से कोई रिश्ता नहीं बनता। अतीत की पत्रकारिता मिशनरी स्वरूप की थी। बाद के वर्षाें में ये प्रोफेशन में तब्दील हो गई। प्रोफेशन में तब्दील होना भी कोई बुराई नहीं है क्योंकि पत्रकारिता के समानांतर मेडिकल और शिक्षण जैसे मिशनरी काम भी प्रोफेशन में बदल गए। हर प्रोफेशन की न्यूनतम मर्यादाएं और मानक होते हैं। पत्रकारिता सिद्धान्तों और आदर्शों से जुड़ा व्यवसाय है। यह व्यवसाय सत्य और तथ्य पर टिका है, इन्हीं से उपजे विश्वास के धरातल पर इस व्यवसाय की बुनियाद कायम है। पत्रकारिता व्यवसाय होने के बावजूद किसी सामान्य उत्पाद की दुकान की तरह नहीं हो सकती। क्योंकि किसी अन्य व्यवसाय में विचारों को प्रभावित करने की वैसी क्षमता नहीं होती जैसी कि पत्रकारिता में है। चिंता की बात यह है कि पत्रकारिता के भीतर एक तबके ने प्रोफेशन के मानकों को किनारे करते हुए इसे पेड न्यूज जैसे काले ध्ंाधे में बदल दिया है।



संभव है कि कुछ लोग यह तर्क दें कि अतीत में भी ऐसे पत्रकार रहे हैं जो खबरों के बदले लाभ पाते रहे हैं या लाभ पाने की कोशिश करते रहे हैं। उपरोक्त बात सही हो सकती है, लेकिन ऐसे मामलों को इसलिए पेड न्यूज कहना मुश्किल क्योंकि तब खबरों के लिए न कोई दर तय की गई थी और न ही इसे सांस्थानिक स्तर पर लागू करने का प्रयास किया गया था। वस्तुतः यह इक्का-दुक्का पत्रकारों की भ्रष्ट-पत्रकारिता थी, न कि पेड न्यूज। नए दौर की राजनीति और जीवन में नैतिक मूल्यों के पतन ने पिछले कुछ वर्षों में जिस तेजी से पेड न्यूज को बढ़ाया है, उससे यह एक बड़ी गंभीर समस्या के रूप में विकसित हुई है। जिस तरह सारे नैतिक, सामाजिक और व्यवसायिक मूल्यों को नजरअंदाज करके राजनेता, औद्योगिक घराने और मीडिया पेड न्यूज में लिप्त हैं, उसे देखकर यह आशंका प्रबल होने लगती है कि इस पर रोक न लगी तो कहीं मीडिया विश्वसनीयता से हाथ न धो बैठे। इस मामले की गंभीरता को इसलिए भी समझा जाना चाहिए कि ‘न्यूज‘ उस रूप में प्राॅडक्ट नहीं है जैसे कि कोई कार या चिप्स का पैकेट! न्यूज के साथ आजादी के मूल्य और लोकतंत्र का भविष्य भी आबद्ध है। यह व्यक्ति की सोच को प्रभावित करने की क्षमता रखती है और भविष्य के निर्धारण में भूमिका निभा सकती है। इसलिए न्यूज को प्राॅक्डट मान लेने के बावजूद इसकी शुचिता की चिंता की ही जानी चाहिए।


जैसा कि पूर्व में कहा गया कि किसी तथ्य या सत्य को छिपाकर आर्थिक लाभ पाने के लिए आंशिक सत्य या अर्द्धसत्य का समाचार के रूप में प्रकाशन पेड न्यूज के दायरे में आता है, लेकिन पेड न्यूज को पहचानना आसान नहीं हैै। पेड न्यूज में लिप्त मीडिया घरानों ने इस काम के लिए बहुत बारीक किस्म की रणनीति को अपनाया हुआ है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि चुनाव के वक्त एक ओर अखबार यह दावा करते हैं कि वे पेड न्यूज को बढ़ावा नहीं देंगे और दूसरी ओर अपने विज्ञापन विभाग के जरिये चुनावी न्यूज-पैकेज तैयार करते हैं। ये न्यूज-पैकेज लाखों रुपये के होते हैं। कड़वी सच्चाई यह है कि रिपोर्टरों और संपादकीय विभाग के कर्मियों को उम्मीदवारों को बाध्य करना होता है कि वे एक निश्चित राशि के बदले संबंधित पैकेजों को खरीदें, अन्यथा उनकी कवरेज नहीं हो पाएगी। यानि, खबरों का परोक्ष-बहिष्कार भी पेड न्यूज के दायरे में है। चूंकि, इस मामले में अब कमोबेश सभी बड़े अखबार और चैनल शामिल दिखते हैं इसलिए प्रत्याशी के पास यह विकल्प भी नहीं बचता कि भले ही उसके बारे में किसी एक अखबार में नहीं छप रहा है, कम से कम दूसरे अखबार तो उसकी कवरेज कर रहे हैं! चूंकि, ये दबाव चैतरफा होता है इसलिए प्रत्याशी चाहे या न चाहे, उसे सरेंडर करना ही पड़ता है।


यह भी अब आम तथ्य है कि चुनाव में कालेधन का उपयोग किया जाता है। पेड न्यूज इस उपयोग को बढ़ावा देती है। पेड न्यूज के प्रायः सभी मामलों में कालाधन स्वीकार किया जाता है। इसलिए कई बार प्रत्याशी को यह लगता है कि वह अपने कालेधन का उपयोग करके छिपा हुआ प्रचार पा लेेगा। पिछले कुछ सालों से यह आशंका भी जताई जा रही है कि जिस प्रकार चुनाव के दौरान पेड न्यूज में कालेधन का उपयोग हो रहा है, उसी प्रकार आम दिनों में विभिन्न उत्पादों की कवेरज में भी कालेधन का प्रयोग किया जा रहा है। कंपनियां अखबारों-चैनलों को विज्ञापन देने के साथ-साथ उनसे संबंधित उत्पादों की कवरेज भी चाहती हैं। इस चाहत के पीछे मूल वजह यही है कि पाठकों के मन में विज्ञापन की बजाय खबरों के प्रति ज्यादा गहरा भरोसा है। किसी उत्पाद के विज्ञापन से पाठक उतना प्रभावित नहीं होता, जितना कि उस उत्पाद के बारे में खबर छपने से होता है। मसलन, किसी कंपनी के मोबाइल फोन के फीचर और तकनीकी जानकारी विज्ञापन के जरिये बताने की तुलना में खबर के माध्यम से बताने का कहीं अधिक लाभ होता है। ऐसी खबरें उन्हीं उत्पादों के बारे में प्रसारित-प्रकाशित होती हैं, जिनके बारे में व्यापक स्तर पर विज्ञापन जारी किए जाते हैं। मोटे तौर पर पेड न्यूज को इन हिस्सों में बांटकर देखते हैं-


1-किसी समूह, राजनीतिक दल, उद्योग, संगठन या संस्थान को लाभ पहुंचाने के लिए धन लेकर एकपक्षीय समाचार प्रसारित/प्रकाशित करना।
2-किसी एक खास व्यक्ति, राजनीतिक दल या समूह अथवा उत्पाद के बारे में लगातार सकारात्मक और प्रचारात्मक समाचार प्रसारित/प्रकाशित करना और उसी के समान अन्य मामलों की इरादतन अनदेखी करना।
3-विज्ञापनों को न्यूज की शक्ल में पाठकों के सामने रखना। न्यूज स्पेस के लिए पैसे लेकर उस स्थान पर प्रचारात्मक खबरों का प्रकाशन करना।
4-किसी एक व्यक्ति, समूह, राजनीतिक दल या कंपनी से पैसा लेकर संबंधित के प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ नकारात्मक खबरें प्रसारित/प्रकाशित करना।
5-किसी भी मामले में एकपक्षीय और शरारतपूर्ण खबरें प्रकाशित करना और इनके बदले संबंधित पक्ष या पक्षों से पैसा लेना।
6-किसी खास मामले में पैसे लेकर नकारात्मक या सकारात्मक माहौल बनाने की कोशिश करना।
7-प्राॅडक्ट्स के मामले में पैसे लेकर ऐसी तुलनाएं प्रकाशित करना जो सत्य के अनुरूप न हों। कुछ मामलों में इन्हें जरूरत से ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाता है।
8-ऐसी सभी खबरें जिनमें पैसा लेकर सत्य, निष्पक्षता, तटस्थता और तथ्यात्मकता की अनदेखी की गई हो।


अगर, हम आदर्शाें से परे जाकर देखें तो कह सकते हैं कि बाजार में किसी भी उत्पाद के बहुत-से नकली उत्पाद मौजूद होते हैं। उपभोक्ता अपने अभ्यास से यह जान लेता है कि कौन-सा उत्पाद असली है। इसी प्रकार वह खबरों के बारे में भी जान लेगा कि कौन-सी खबर पेड न्यूज है और कौन-सी असली न्यूज है! लेकिन, व्यावहारिक तौर पर यह संभव नहीं है। इसीलिए पेड न्यूज अपने आप में एक गंभीर खतरा बन जाती है। ज्यादा गहरे तक देखें तो यह अर्द्धसत्य या असत्य को सत्य के तौर पर स्थापित करने की कोशिश करती है। यह लोगों को भ्रमित करने और गलत पक्ष में खड़े होने के लिए प्रेरित कर सकती है। यानि, पत्रकारिता के बुनियादी लक्ष्य, लोगों को जागरूक करना और जनमत निर्माण करना, को नकारात्मक ढंग से प्रभावित करती है। विस्तार में देखें तो यह पूरी व्यवस्था के लिए खतरा है। यह इतनी ताकतवर है कि पत्रकारिता के प्रति लोगों के भरोसे को हमेशा के लिए डिगा सकती है। मीडिया में पेड न्यूज के स्थापित होने पर ऐसे लोगों को भी इस प्रोफेशन में आने को प्रोत्साहन मिल सकता है जो सत्य और नैतिकता को दांव पर लगाकर भी लाभ पाना चाहते हैं। मीडिया पर निगाह रखने वाले लोग यह अच्छी तरह जानते हैं कि मीडिया मालिकान किसी भी कीमत पर मुनाफा चाहते हैं। मुनाफे की उनकी भूख ने पेड न्यूज को विकराल होने का मौका दिया है। पेड न्यूज के मामले में केंद्रीय चुनाव आयोग के पास साल-दर-साल शिकायतें बढ़ रही हैं। शिकायतों की संख्या बता रही है कि पेड न्यूज की समस्या लगातार गहरी हो रही है। पेड न्यूज की समस्या इतना गंभीर रूप धारण कर चुकी है कि पत्रकारिता की अस्मिता और सम्मान के लिए चिंतित पत्रकार, प्रबुद्ध समाज, भारतीय प्रेस परिषद और निर्वाचन आयोग तक इसे एक गंभीर समस्या मान रहे हैं। पिछले दिनों जस्टिस काटजू इस पर टिप्पणी भी कर चुके हैं। वे इसकी गंभीरता की ओर इशारा भी कर चुके हैं। वास्तव में, वह स्थिति बेहद भयानक होगी, जब खबरों की खुलेआम बिक्री होने लगे। जिसके पास पैसे की जितनी ताकत हो, वह उतने ही स्पेस में पेड न्यूज छपवा ले। ऐसी स्थिति में न्यूज और नैतिकता का जनाजा निकल जाएगा। इससे निपटने के लिए कुछ मोटे कदम उठाए जाने की तत्काल जरूरत है। इनमें से कुछ इस प्रकार हो सकते हैं-
1-सभी अखबारों-चैनलों में अनिवार्य तौर पर आम्बड्समैन की नियुक्ति होनी चाहिए। इसे पेड न्यूज के मामले में जिम्मेदार अधिकारी बनाया जाना चाहिए।
2-पेड न्यूज में लिप्त अखबारों-चैनलों के पंजीकरण और लाइसैंस लंबित करने का प्रावधान होना चाहिए।
3-जिस प्रकार खबरों के लिए पीआरबी एक्ट के तहत समाचार-संपादक को जिम्मेदार माना जाता है, उसी प्रकार पेड न्यूज के मामले में समूह-संपादक या प्रधान-संपादक को जवाबदेह मानना चाहिए।
4-पेड न्यूज में लिप्त अखबारों-चैनलों को दिए जाने वाले सरकारी विज्ञापनों पर रोक लगानी चाहिए।
5-पत्रकारों को पेड न्यूज से बचाव के संबंध में प्रशिक्षण की व्यवस्था की जानी चाहिए।
6-पेड न्यूज के मामले में दोषी पाए गए अखबारों-चैनलों के नाम सार्वजनिक किए जाने चाहिए।
7-पेड न्यूज के प्रकरणों में कार्रवाई के लिए प्रेस कौंसिल को और अधिकार दिए जाने चाहिए।
8-पेड न्यूज के प्रकरणों के लिए अलग ट्रिब्यूनल का गठन किया जाना चाहिए।
9-पेड न्यूज के मामलों में लगातार दोषी पाए जाने वाले चैनलों-अखबारों को स्थायी तौर पर बंद किया जाना चाहिए।
10-राजनीतिक दलों, कंपनियों को प्रेरित करना चाहिए कि वे पेड न्यूज को अनैतिक कृत्य की तरह लें।

यदि आपके पास भी मीडिया जगत से संबंधित कोई समाचार या फिर आलेख हो तो हमें jansattaexp@gmail.com पर य़ा फिर फोन नंबर 9650258033 पर बता सकते हैं। हम आपकी पहचान हमेशा गुप्त रखेंगे। - संपादक

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