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न्यूज, पेड न्यूज और फेड न्यूज!

Sushil Upadhyay । भले ही साल दर साल वेब-न्यूज का प्रयोग बढ़ रहा हो, लेकिन यह भी सच्चाई है कि अखबारों की प्रसार-संख्या में भी लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। कुछ साल पहले निजी
न्यूज, पेड न्यूज और फेड न्यूज! Sushil Upadhyay । भले ही साल दर साल वेब-न्यूज का प्रयोग बढ़ रहा हो, लेकिन यह भी सच्चाई है कि अखबारों की प्रसार-संख्या में भी लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। कुछ साल पहले निजी चैनलों की आमद के बाद आशंका जताई गई थी कि आने वाले बरसों में अखबारों का अंत हो जाएगा। इसी प्रकार की आशंका उस वक्त जताई गई, जब इंटनरेट पर खबरों का दौर आरंभ हुआ। लेकिन, यथार्थ यह है कि भारत में पढ़े-लिखे लोगों में से ज्यादातर लोग अब भी अखबारों-पत्रिकाओं पर निर्भर हैं और इन्हीं को खबरों के प्रथम स्रोत के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। छपे हुए अक्षर के प्रति सदियों पुराना आकर्षण किसी भी नए मीडिया माध्यम की मौजूदगी से प्रभावित नहीं हुआ है और न ही अब इसके प्रभावित होने की संभावना दिख रही है।



बल्कि, इसके उलट प्रिंट मीडिया के और अधिक विस्तार पाने की संभावना दिख रही है, इसकी वजह यह है कि दुनिया में अब भी सबसे अधिक निरक्षर भारत में हैं और अगले एक-डेढ़ दशक में निरक्षरों की संख्या में बड़ी कमी दिखाई देगी और साक्षरों की संख्या में इजाफा होगा। इसका अर्थ यह है कि अखबारों-पत्रिकाओं के पास एक नया और बड़ा पाठक वर्ग मौजूद होगा। यह ऐसा पाठक वर्ग होगा जो वेब न्यूज के साथ-साथ प्रिंट मीडिया से भी खबरें हासिल करेगा।



भारत में लंबे समय से लोगों को यह भरोसा रहा है कि जो छपता है, वो सच है, लेकिन अब यह भरोसा डगमगा रहा है। लोगों के मन में किसी न किसी स्तर पर शंका पैदा हो रही है कि जो कुछ छप रहा है, वह हमेशा सच ही नहीं होता। यह भी संभव है कि इरादतन ऐसी सामग्री को परोसा गया है, जिसके बारे में अखबारों-पत्रिकाओं को यह पता था कि ये सच नहीं है। इस सामग्री को इसलिए प्रकाशित किया गया कि इसके प्रदाता ने प्रकाशन के बदले में कीमत का भुगतान किया था। पारिभाषिक शब्दों में कहें तो सच की कसौटी से परे जाकर जो सामग्री किसी कीमत के बदले प्रकाशित की गई है वह ‘पेड न्यूज’ं है। न्यूज की यह श्रेणी भले ही नई लगती हो, लेकिन ढके-छिपे तौर पर कई बरसों से इसका अस्तित्व मौजूद है और पेड न्यूज की इस चुनौती के आकार में लगातार बढ़ोत्तरी हुई है।


मीडिया के ज्यादातर लोगों का मानना है कि पेड न्यूज की शुरुआत बेनेट कोलेमन एंड कंपनी के प्रकाशनों से शुरू हुई। टाइम्स आॅफ इंडिया, फाइनेंशियल टाइम्स और नवभारत टाइम्स जैसे अखबार प्रकाशित करने वाली इस कंपनी ने कुछ इवेंट्स और प्राॅडक्ट्स की लांचिंग कवरेज के बदले पैसे लिए थे। यह अलग बात है कि इस कवरेज को मुख्य समाचार पृष्ठों की बजाय अन्य पृष्ठों पर या फिर स्पेशल सप्लीमेंट के तौर पर प्रकाशित किया गया। कंपनी की ओर से यह तर्क दिया जाता रहा है कि इस प्रकार की खबरों का प्रकाशन विज्ञापन-सामग्री की विश्वसनीयता में बढ़ोत्तरी की कोशिश थी और इसे सीधे तौर पर न्यूज की तरह न देखा जाए। यह भी दावा किया गया कि पाठकों को इस बारे में अवगत कराया गया कि एडवीटोरियल और इम्पैक्ट न्यूज, ये ही दोनों ही न्यूज से भिन्न हैं। कंपनी के तर्क अपनी जगह सही हो सकते हैं, लेकिन सच यही है कि उस वक्त पाठकों के पास ऐसी कोई समझ और जागरूकता नहीं थी कि वे यह पता लगा सकें कि संबंधित सप्लीमेंटों को पैसा लेकर न्यूज के आकार में प्रकाशित किया गया है। इसी आधार पर पेड न्यूज को पाठकों के साथ धोखाधड़ी भी माना गया।


इस धंधे के एक बार शुरू होने के बाद ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती गई जो पैसा देकर खुद की कवरेज कराना चाहते हैं या अपने आयोजनों की खबरों को अखबार में मनचाहे स्थान पर जगह दिलाना चाहते हैं। पेड न्यूज का मामला इंवैंट और प्राॅडक्ट्स लेकर फिल्मों के प्रचार और सिने कलाकारों की कवरेज तक जा पहुंचा। कुछ कंपनियों ने खुद को प्रचार में बनाए रखने के लिए नकली-विवादों को बढ़ाया और फिर पैसा देकर इन्हें खबर के तौर पर भी प्रकाशित कराया। और जैसा कि आशंका थी, पेड न्यूज की बीमारी भारत के राजनेताओं तक पहुंच गई। जल्द ही राजनेताओं और अखबारों-पत्रिकाओं के बीच इस धंधे को लेकर गठजोड़ की स्थिति भी बन गई। यह गठजोड़ इसलिए भी बन गया क्योंकि देश में पेड न्यूज को लेकर अलग से कोई ठोस कानून नहीं है। कानूनी की बंदिश न होने के कारण यह मामला महज नैतिकता की बहस तक सिमटकर रह गया।


प्रकारांतर से मीडिया माध्यमों पर छोड़ दिया गया कि वे नैतिकता के आधार पर पेड न्यूज से अलग रहें। लेकिन, जहां बिजनेस की बात हो, वहां महज नैतिकता के आधार पर पेड न्यूज से अलग रहने के तर्क में कोई दम नजर नहीं आया। देश में यह मान लिया गया कि राजनीति संबंधी पेड न्यूज का ताल्लुक केवल चुनाव गतिविधियों तक ही सीमित है इसलिए इस मुद्दे पर जो कुछ भी करना है, वह चुनाव आयोग को ही करना है। जबकि, चुनाव आयोग का मूल काम पेड न्यूज से जुड़ा हुआ नहीं है, बल्कि उसे चुनाव से जुड़े खर्चाें पर नजर रखनी होती है। ऐसे में, यदि कोई व्यक्ति पैसा देकर खबरें प्रकाशित कराता है तो चुनाव आयोग उसे नोटिस दे सकता है और संबंधित खर्च को चुनाव-खर्च में जोड़ सकता है। आयोग को यह अधिकार नहीं है कि पेड न्यूज के मामलों में सभी संबंधित पहलुओं की पड़ताल करे और चुनाव के दायरे से बाहर जाकर कार्रवाई सुनिश्चित कर सके। देश में साल 2010 से लोकसभा चुनाव 2014 तक पेड न्यूज के करीब डेढ़ हजार मामलों में चुनाव आयोग से शिकायत की जा चुकी है।
इसमें सबसे रोचक बात यह है कि जो व्यक्ति पेड न्यूज के लिए पैसा दे रहा है और जो पैसा ले रहा है, इन दोनों में से कोई भी इस बात की पुष्टि नहीं करता कि उनके बीच किसी प्रकार का लेन-देन हुआ है। ऐसे मामलों में सभी शिकायतें तीसरे पक्ष की ओर से की जाती हैं। कई बार ये शिकायतें विरोधाभासी भी होती हैं। मसलन, आमने-सामने चुनाव लड़ रहे प्रत्याशी एक-दूसरे के बारे में आयोग को इस प्रकार की शिकायत भेजते हैं। इसके बाद आयोग की मशीनरी अपने स्तर पर पड़ताल करती है। आयोग के पास ऐसा कोई स्थायी और परिवक्व-तंत्र नहीं है, जिससे वास्तव में वह ये पता लगा सके कि किस न्यूज को पैसे लेकर प्रकाशित किया गया है। क्योंकि पैसे लेकर छापे जानी वाली खबरों में केवल समर्थन में छपी खबरें ही नहीं होती, वरन विरोधियों की छवि पर कीचड़ उछालने की कोशिश संबंधी खबरों के लिए भी पैसा दिया जाता है। ऐसे स्थिति में पाठक के पास कोई तरीका नहीं होगा कि वह पता लगा ले कि कौन-सी खबर पेड न्यूज के दायरे में है। वह ऐसी खबरों को सच्ची खबर मानकर ही उन्हें पढ़ता है।



इस वक्त ऐसा कोई अखबार या चैनल तलाश करना मुश्किल हो जाएगा जो ईमानदारी के साथ यह कह सके कि उसके यहां किसी स्तर पर पेड न्यूज प्रकाशित-प्रसारित नहीं होती। सभी अखबार-पत्रिकाएं पेड न्यूज के धंधे में लिथड़े हुए नजर आते हैं। यह अलग बात है कि सारे मीडिया माध्यम ऐलानिया तौर पर इस बात का उल्लेख करते हैं कि वे पेड न्यूज से दूर हैं। जबकि, किसी भी चुनाव के वक्त ऐसी कहानियां आमतौर पर चर्चा में होती हैं कि किस अखबार को किस प्रत्याशी ने कितना पैसा दिया है। इतना ही नहीं, जिला स्तर तक पर संवादाताओं को चुनावी-पैकेज के रेट कार्ड के साथ प्रत्याशियों के पास भेजा जाता है। इसमें पैसे के उल्लेख से लेकर कवरेज के तौर-तरीकों तक का जिक्र होता है। पिछले कुछ सालों में हरियाणा और पंजाब के चुनाव में ऐसे कई मामले चर्चा में आ चुके हैं।


पेड न्यूज हर प्रकार से निराले ढंग का खेल है। इसे दिल्ली में केजरीवाल के उदय और देश में भाजपा के सत्तारोहण की घटनाओं के संदर्भ में भी समझ सकते हैं। जिन दिनों केजरीवाल दिल्ली में अन्ना हजारे के साथ मिलकर आंदोलन कर रहे थे, उन दिनों उन्हें खूब कवरेज मिली। बाद में, उनके मुख्यमंत्री बनने तक बढि़या कवरेज का सिलसिला थोड़े-बहुत उतार-चढ़ाव के साथ जारी रहा। लेकिन अचानक मीडिया ने अपना रुख बदल लिया। जिस केजरीवाल को मीडिया हाथों-हाथ ले रहा था, उसके स्थान पर मोदी को तरजीह मिलने लगी और कुछ ही वक्त में पूरे परिदृश्य पर मोदी और भाजपा छा गए। तब लोगों के जेहन में यह बात उठी कि आखिर केजरीवाल कहां गायब हो गए ? यही सवाल कांग्रेस को लेकर भी था। असल में, सत्ता के भावी-समीकरणों से समाचार माध्यमों, खासतौर से अखबार-पत्रिकाओं और चैनलों ने अपने आप को नए ग्राहकों को सौंपना बेहतर समझा।
इसके पीछे का सच यह था कि केजरीवाल की नई-नवेली पार्टी और उसके अनगढ़ नेता अभी इस बात के लिए दीक्षित-प्रशिक्षित नहीं थे कि मीडिया को मैनेज करने में पेड न्यूज की भी बड़ी भूमिका होती है। उन्हें यह भ्रम था कि दिल्ली के लोग पार्टी के साथ हैं, इसलिए उन्हें कवरेज देना मीडिया की मजबूरी है। लेकिन, मीडिया ने जल्द ही बता दिया कि वे किसी मजबूरी से नहीं बंधे हुए हैं, वे अपने हितों को ही केंद्र में रखकर कार्य कर रहे थे। नए राजनीतिक संकेतों से मीडिया को पता चल रहा था कि अब भाजपा के साथ चलने में ही फायदा है। इसलिए केजरीवाल एंड पार्टी पूरे परिदृश्य से गायब हो गई और अचानक ही सारा मीडिया मोदी के आभामंडल से चमत्कृत हो गया। मीडिया खुले तौर पर मोदी की ओर झुका दिखने लगा। ऐसी चर्चा भी सुनने को आई कि कुछ मालिकों ने अपने अखबारों-चैनलों के संपादकों को साफ तौर पर कह दिया कि खबरों में मोदी के विरोध से बचा जाए। इसके बाद ऐसे विश्लेषकों की आमद टीवी चैनलों पर कम हो गई जो खुलेतौर पर मोदी का विरोध करते रहे हैं। इसके स्थान पर मोदी और भाजपा समर्थक विशेषज्ञों की बाढ़ आ गई। तो क्या बाढ़ के पीछे भी पेड न्यूज का गणित ही काम कर रहा था ?


दर्शक और पाठक के मन में यह सवाल आज भी बना हुआ है कि वह कौन-सी बात थी, जिसके चलते अखबारों-चैनलों ने अपना सुर बदल दिया। बाहरी तौर पर मीडिया के पास एक आवरण यह था कि लोग मोदी और भाजपा का समर्थन कर रहे हैं। चूंकि, लोग समर्थन कर रहे थे इसलिए मोदी और भाजपा पर फोकस करना पत्रकारिता के मानदंडों के अनुरूप् थे। चुनाव के साल भर पहले तक यही मीडिया नरेंद्र मोदी को गुजरात दंगों के गुनहगार के तौर पर देख रहा था। मोदी को इस लायक तक नहीं समझ रहा था कि उन्हें प्राइम टाइम में या पहले पन्ने पर जगह दी जाए! लेकिन, मीडिया ने अचानक खुद को समर्पित कर दिया। वह मोदी के प्रति संवदेनशील और विनम्र हो गया। बात साफ है कि यह विनम्रता पत्रकारों-संपादकों की तरफ से कम, उनके कार्पाेरेट मालिकों की ओर से ज्यादा थी। इसीलिए पत्रकार भी झुके हुए दिख रहे थे। ऐसे हालात में मुख्यधारा के मीडिया में केवल वे ही सवाल उठाए जा रहे थे, जो किसी भी स्तर पर मोदी या भाजपा को कठघरे में खड़ी न करते हों।



जैसे ही मीडिया ने खुद को मोदी के रंग में रंगा तो पेड न्यूज का सवाल और बड़ा होकर सामने आया। यह पहली बार हुआ था कि पेड न्यूज को इस प्रकार केंद्रीयकृत स्तर पर लागू करने की कोशिश की गई थी। यानि, अब यह मामला स्थानीय स्तर पर मैनेज करने की सीमा को अतिक्रमित कर चुका था। इसका परिणाम यह हुआ कि लोगों को पेड न्यूज के मामले में अपनी शंकाएं सच होती दिखी। क्योंकि ज्यादातर चैनलों-अखबारों से न केवल कांग्रेस, वरन समाजवादी पार्टी, बसपा, वामपंथी पार्टियां और अन्य इलाकाई पार्टियां गायब हो गईं। यह सच है कि पेड न्यूज की प्रैक्टिस से मीडिया मालिकान ने काफी कुछ हासिल किया, लेकिन यह भी इतना ही सच है कि मीडिया को अपनी साख पर एक बड़ा सवालिया लगवाना पड़ा है। न्यूज के साथ जैसे ही पैसे का जोड़ जुड़ा तो यह पेड न्यूज से होती हुई फेड-न्यूज तक पहुंच गई। परिणामतः न्यूज की आभा मटमैली-सी हो गई।

यदि आपके पास भी मीडिया जगत से संबंधित कोई समाचार या फिर आलेख हो तो हमें jansattaexp@gmail.com पर य़ा फिर फोन नंबर 9650258033 पर बता सकते हैं। हम आपकी पहचान हमेशा गुप्त रखेंगे। - संपादक

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