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प्रामाणिकता की कसौटी पर खरी है यह बेबाक बयानी

किसी भी लेखन, विशेषत: संस्मरणात्मक और विश्लेषणात्मक लेखन की श्रेष्ठता की पहली और अनिवार्य शर्त होती है, उसमें वर्णित तथ्यों की विश्वसनीयता। इस कसौटी पर डॉ. सुशील उपाध्याय की पुस्तक सौ फीसद कामयाब है। हालांकि वह मेरे बेहद विश्वसनीय और काबिल सहयोगी रहे हैं, लेकिन उन्होंने इस पुस्तक के जरिये तथ्यात्मक ईमानदारी
प्रामाणिकता की कसौटी पर खरी है यह बेबाक बयानी Sushil Upadhyay के फेसबुक वाल से। मेरे संपादक रहे आदरणीय एल.एन.शीतल जी ने मेरी प्रकाशानाधीन किताब के लिए ये भूमिका लिखी है। अपने इस काम पर मैं इससे बेहतर और मार्गदर्शक-टिप्पणी की उम्मीद नहीं कर सकता था। शीतल जी ने जो आशीर्वाद दिया है, उनके लिए ‘धन्यवाद’ कह देना बहुत छोटा शब्द है। उनका मागर्दशन हमेशा मिलता रहे, यही कामना है।

प्रामाणिकता की कसौटी पर खरी है यह बेबाक बयानी

किसी भी लेखन, विशेषत: संस्मरणात्मक और विश्लेषणात्मक लेखन की श्रेष्ठता की पहली और अनिवार्य शर्त होती है, उसमें वर्णित तथ्यों की विश्वसनीयता। इस कसौटी पर डॉ. सुशील उपाध्याय की पुस्तक सौ फीसद कामयाब है। हालांकि वह मेरे बेहद विश्वसनीय और काबिल सहयोगी रहे हैं, लेकिन उन्होंने इस पुस्तक के जरिये तथ्यात्मक ईमानदारी, पत्रकारिता के सभी पहलुओं के प्रति अपनी गहरी समझ और अत्यन्त सूक्ष्म विश्लेषण की क्षमता का जो प्रामाणिक परिचय दिया है, उसकी मुझे कल्पना तक नहीं थी। उन्होंने मीडिया में उत्तरोत्तर बिगड़ती भाषा, अपने साथ किसी भी रूप में काम कर चुके पत्रकारों से जुड़े निजी अनुभवों, निरन्तर असम्वेदनशील होते जा रहे अखबारी प्रबन्धनों, टीवी चैनलों की बेशर्मियों व मूर्खताओं, अपने पत्रकारीय जीवन के प्रारम्भिक संघर्षों, अपने वैचारिक धरातल, और ऐसे ही अन्य अनेक विषयों को बहुत बेबाकी, शिद्दत और ईमानदारी से पेश किया है, जो बेहद काबिलेतारीफ है।

प्रिण्ट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में दिन-ओ-दिन विकृत होती जा रही भाषा के प्रति डॉ. उपाध्याय अत्यन्त खिन्न हैं, और कोई भी सम्वेदनशील व्यक्ति उनकी इस खिन्नता से असहमत नहीं हो सकता। किसी भी अखबार के बारे में भाषा के आधार पर ही कहा जाता है कि फलां अखबार हिन्दी का है, कि कन्नड़ का है, कि अँगरेज़ी का है। इसी से समझ लीजिए कि पत्रकारिता में भाषा का महत्व कितना ज्य़ादा है। जब देश के सभी हिस्सों में अँगरेज़ी शब्दों की वर्तनियाँ एक समान हैं, आईपीसी-सीआरपीसी एक समान हैं, और ट्रैफिक सिगनल एक समान हैं, तो फिर हिन्दी शब्दों की वर्तनियाँ एक समान क्यों नहीं हैं? हिन्दी के बूते दौलत के टापू बनाने वाले, हिन्दी के जरिये अपना पेट पालकर शान बघारने वाले और अन्य अनेक तरीकों से हिन्दी के नाम पर धन्धेबाजी कर रहे लोग भूल जाते हैं कि जो कौमें अपनी भाषा नहीं बचा पातीं, वे एक दिन दफन हो जाया करती हैं। हिन्दी को पण्डिताऊ जकडऩ से मुक्त करके उसे आमफ़हम तो बनाया जाना चाहिए, और तर्कसंगत तरीके से उसका शब्द-आधार भी बढ़ाया जाना चाहिए, लेकिन उसकी शुद्धता की अनदेखी हरगिज नहीं की जानी चाहिए।

डॉ. उपाध्याय ने राजधानी दिल्ली में जमे पत्रकारों की उबकाऊ असलियत को बेहद खूबसूरत अन्दाज में बयां किया है। वह लिखते हैं - छोटी जगहों पर पत्रकारिता करते हुए लगता है कि दिल्ली में बैठे तमाम पत्रकार महामानव हैं। उनमें नारद, हनुमान, व्यास और महाभारत के संजय, सभी की खूबियाँ समायी हुई हैं। लेकिन, जब आप उनके साथ काम करते हैं या पत्रकारिता से सम्बन्धित कोई मदद मांगते हैं तो वे एकदम भिन्न किस्म के जीव नजर आते हैं। इन जीवों को जब सत्ता की चाशनी में लिथड़ा हुआ देखते हैं, तो अजीब-सी वितृष्णा के भाव से नहीं बच सकते। दिल्ली ऐसी मायावी है कि कुछ ही वक्त में लोगों को यह कहने पर मजबूर कर देती है कि , ‘मैं तो दिल्ली का ही हूं।‘ इस पैमाने पर पंजाबी, बिहारी, राजस्थानी, मराठी, बंगाली, पहाड़ी आदि आदि..., इन सभी में कुछ बरसों के बाद दिल्ली के पत्रकारों जैसी खूबियाँ उभर आती हैं।

लेखक के इस निष्कर्ष से असहमत होने की कोई गुंजाइश नहीं है कि मीडिया की डिग्रियाँ बाँट रहे संस्थानों में दिये गये 'ज्ञान’और अखबारी दफ्तरों के कामकाज के बीच कोई तारतम्य नहीं है। लेकिन विसंगति यह है कि अब मीडिया की दुकानों में नौकरी के लिए यही डिग्रियाँ अनिवार्य हो गयी हैं। साल, 1993 में जब वह नवभारत, भोपाल में काम सीखने गये तो यह बात पहले दिन ही उनकी समझ में आ गयी थी कि जो कुछ क्लास रूम में पढ़ा है, उसका पत्रकारिता के कामकाज से सीधे तौर पर कुछ लेना-देना नहीं है।

डॉ. उपाध्याय न्यूज चैनलों की शर्मनाक स्थिति पर अत्यन्त वाजिब और मकाबूत वजहों से बहुत ज़्यादा खफा हैं। वह अपना क्षोभ कुछ इस तरह व्यक्त करते हैं - ‘साल 2014 के अप्रैल के आखिरी सप्ताह में एबीपी न्यूज और ज़ी न्यूज पर मोदी के इंटरव्यू देखने के बाद से ऐसा लग रहा है कि पत्रकार और पत्रकारिता की परिभाषा को नये सिरे से परिभाषित किया जाना चाहिए। पत्रकार की विशेषताओं का भी पुनर्निर्धारण होना चाहिए और सम्भव हो तो उनमें भाण्ड, चारण, दरबारी और अहलकार जैसे गुणों को भी शामिल करना चाहिए। जो जितना नीचे गिरकर पैर पकड़ता दिख सकता है, वही सक्षम पत्रकार हो सकता है! जब, पत्रकारों की हैसियत ऐसी नहीं है कि वे सवालों के जवाब हासिल कर सकें तो फिर ऐसे इंटरव्यू का औचित्य क्या है?

लेखक की यह निष्पत्ति पूरी तरह से सही है कि मीडिया एक स्वतन्त्र हैसियत वाली सत्ता के बजाय, प्राय: एक टूल में तब्दील होता दिखने लगता है। यह टूल दिन-रात इस कोशिश में जुटा है कि दर्शक सोचना बन्द करें। इसके पीछे मकसद साफ है कि जो भी इस टूल के जरिये प्रसारित-प्रचारित हो रहा है, उसी को अन्तिम सच माना जाये। और, जो इस सच को मानने से मना करे, उस पर सवाल खड़े किये जायें। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि पत्रकारिता अब कारोबार है। उपाध्याय जी, आज की पत्रकारिता कारोबार नहीं, केवल धन्धा है। वेश्याओं वाला धन्धा। कारोबार में तो एथिक्स की थोड़ी-बहुत गुंजाइश फिर भी बची रहती है, मगर इस धन्धे में नहीं। इसमें काले धन का वर्चस्व है। काले धन को ज्यादा से ज्यादा बढ़ाने की अन्धी होड़ में लगे लोगों का कब्जा मीडिया के एक बड़े हिस्से पर हो चुका है। ज्य़ादातर हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में सम्पादक बिजनेस और सेल्स मैनेजर के रूप में ढल चुके हैं। विज्ञापन देने वाली मोटी पार्टियों के कालिख पुते चेहरों को चमकाने, उनके टारगेट पर आयी शत्रु पार्टियों, और विज्ञापन नहीं देने वाली पार्टियों के चेहरों पर कालिख पोतने का दौर है यह। ऐसे दौर में सूचनाओं की बाढ़ आ जाती है। झूठी, सच्ची, भ्रामक यानि कैसी भी सूचनाएँ।

डॉ. उपाध्याय पत्रकार का चोला ओढ़कर अपने सियासी आकाओं के हुक्मों की तामीली में जुटे रहने वाले और अपनी 'उपलब्धयों’ पर इतराते-इठलाते-पगलाते डॉ. वेद प्रताप वैदिक सरीखे लोगों की खबर लेने से भी नहीं चूके हैं। वह लिखते हैँ - ‘पत्रकारिता के पेशे में लम्बा समय बिताने के बाद मैं आसानी से कह सकता हूँ कि ऐसे पत्रकार अपवाद रूप में ही मिलेंगे, जो आत्ममुग्धता के शिकार न हों, जो किसी का दूत या प्रतिनिधि बनने को तैयार न हों, या जो मुफ्त की मलाई खाने को तैयार न हों। सच यही है कि पत्रकार किसी का सगा नहीं होता। वह वक्त को भी दगा देना चाहता है। केवल खुद के लिए जीता है, लेकिन लोकमंगल का आवरण ओढ़े रहता है।‘

मीडिया को कैंसर की तरह अपनी गिरफ्त में ले चुकी चाटुकारिता और अवसरवादिता पर चोट की एक बानगी देखिए - ‘किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ लिखना हो तो यह अवसर उस वक्त मिलता है, जब व्यक्ति की कुर्सी छिनने वाली हो। जैसे, जब खंडूड़ी को हटाया जाना था तो अखबारों ने उनके खिलाफ लिखा, इसी तरह जब डॉ. निशंक की कुर्सी जाने वाली थी तो वह भी मीडिया के निशाने पर आ गये। मीडिया इतना चालाक है कि वह अपने शिकार को ठीक वक्त पर चुन लेता है।

एक रोचक प्रसंग। लेखक महोदय और उनके गहरे मित्र जितेन्द्र अंथवाल अपने सम्पादक के बारे में अपने 'पवित्र विचार’ मूत्रदान-प्रक्रिया के दौरान खुलकर व्यक्त कर रहे थे। उन बेचारों को क्या पता था कि सम्पादक जी भी उसी वक्त टॉइलेट में भीतर बैठे फारिग होते हुए अपने बारे में अपने सहकर्मियों के ‘उद्गारों’ को सुन रहे हैं। इस पर उपाध्याय जी की ‘सीख’ है कि पेशाबघर में किसी के बारे में कुछ भी चर्चा करते वक्त इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कोई लैट्रीन के बन्द दरवाजे के पीछे तो नहीं बैठा हुआ है। लेखक ने ऐसे ही कई रोचक प्रसंगों को दिलकश अन्दाज में पेश किया है, जिनमें से कई में टारगेट पर मैं रहा हूँ।

सुशील उपाध्याय जी अपने पत्रकारीय जीवन के प्रारम्भिक दिनों में नामचीन लोगों से मिलने को बहुत बेताब रहा करते थे। बेताबी के इसी आलम में वह अपने एक मित्र के साथ राजेन्द्र यादव के यहाँ जा धमके और उन्होंने इन्हें अखबारी दफ्तरों के अन्दरूनी सूरतेहाल पर एक लघु उपन्यास लिखने को कह दिया, जिसे वह ‘हंस’ में प्रकाशित करते। यादवजी तो स्वर्ग सिधार गये, लेकिन उपाध्याय जी वह उपन्यास आज तक नहीं लिख पाये! कैफियत उन्हीं के शब्दों में - ‘उपन्यास की मौत तो उसी दिन हो गयी थी, जिस दिन हमने पूरे जहान में इस बात का प्रचार कर दिया था कि राजेन्द्र यादव ने हमें मीडिया पर लघु उपन्यास लिखने को कहा है। वस्तुत: हम दोनों ने उसी दिन इस उपन्यास को लिखा हुआ मान लिया था। इससे जो आत्मप्रचार और लोकेष्णा का सुख मिलना था, वह भी मिल चुका था। इसलिए उपन्यास लिखने की जरूरत ही महसूस नहीं हुई। कितना सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक विश्लेषण यह! इससे बड़ों-बड़ों को सीख लेने की ज़रूरत है।

वह अपने बारे में बहुत साफगोई से लिखते हैं - ‘मैं जन्मना तो दलित या अल्पसंख्यक नहीं हूं, लेकिन कर्मणा कई बार खुद को दलित या अल्पसंख्यक की तरह ही पाता हूँ। मेरे निकट के मित्रों की सूची में दलितों और मुसलिमों के नाम बहुसंख्या में हैं। मेरी निजी आस्था भी बौद्घ-मार्ग में ज्यादा है, मुझे हिन्दुत्व नहीं लुभाता। आरक्षण पर मेरे विचार सवर्णोंसे भिन्न रहे हैं और मैं आज भी इसका पक्षधर हूँ। मैं उन सवर्णीय टिप्पणियों में खुद को शामिल नहीं पाता, जो प्राय: दलितों, अल्पसंख्यकों के बारे में अखबारों में इरादतन लिखी जाती हैं। सिस्टम में दलितों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं की आमद रोकने को आतुर लोगों से मेरा चिर-वैर है। अब, ऐसे में मीडिया के धुरन्धर मुझे दलित या अल्पसंख्यक मान बैठें तो उनका भी कोई दोष नहीं!’

मीडिया से जुड़े लोगों को भ्रम होता है कि वे समाज सुधारक भी हैं। उनकी जहनियत पर सवार समाज सुधारक का यह भूत उनकी खबरों पर भी हावी हो जाता है। ऐसे लोग पत्रकारिता का यह पहला और बुनियादी उसूल भूल जाते हैं कि समाचार में तथ्य पवित्र होता है, विचार नहीं। जिसे अपने विचार व्यक्त करने हैं, वह लेख लिखे। लेखक को यह बात एक लम्बे अनुभव के बाद समझ में आयी। वह लिखते हैं - ‘अब लगता है कि वे तमाम बातें पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धान्तों के विपरीत थीं, क्योंकि हमारा काम किसी को सुधारना नहीं, बल्कि अपने पाठकों तक सूचनाएँ पहुँचाना था। जबकि, हम रिपोर्टर से कहीं आगे बढ़कर सोशल वॉलिण्टियर की तरह काम कर रहे थे।‘

आज के लगभग सभी हिन्दी अखबार पठनीयता की दृष्टि से किस कदर खोखले हो गये हैं, इसकी भी बेहतरीन बानगी उन्होंने पेश की है, और इस खोखलेपन के प्रति उनके चिन्ताजन्य आक्रोश से असहमति की कहीं कोई गुंजाइश नहीं है। वह लिखते हैं – ‘अमर उजाला, दैनिक हिन्दुस्तान और दैनिक जागरण को पढ़ने में बमुश्किल एक घण्टा लगता है। वह भी तब, जबकि मैं सम्पादकीय पृष्ठ पर भी अनिवार्य तौर पर निगाह डालता हूँ। इनकी तुलना में ‘द हिन्दू’ और ‘इण्डियन एक्सप्रेस’ में इतनी अधिक सामग्री होती है कि दोनों को ठीक से पढ़ने के लिए तीन-चार घण्टे का वक्त चाहिए। इस तुलना के जरिये केवल इतनी बात कहनी है कि हिन्दी अखबार ठीक से अँगरेजी अखबारों की कॉपी भी नहीं कर पा रहे हैं। यदि, वे महज अनुवाद ही कर लें तो यकीनन हिन्दी पाठकों को भला होगा। वरना, जूठन छापते रहिए और वह भी कई-कई दिन पुरानी!

डॉ. उपाध्याय अपने कभी वरिष्ठ-कनिष्ठ रहे उन साथियों के बारे में अपना मलाल सविस्तार बयां करते हैं, जो उनकी निगाह में बहुत योग्य होने के बावज़ूद सम्पादक नहीं बन पाये। इसी के साथ वह ऐसे कुछ लोगों के बारे में भी बताते हैं, जो अपनी पेशेवराना योग्यताओं से इतर कुछ ‘अन्य योग्यताओं’ के चलते कम समय में ही सम्पादक बन गये। चूँकि, यह उनकी नितान्त वैयक्तिक राय है, इसलिए उससे असहमति की गुंजाइश को नकारा नहीं जा सकता। हाँ, लेखक के बारे में दावे के साथ कहा जा सकता है कि वह भी शर्तिया तौर पर दस वर्षों में सम्पादक बन गये होते, बशर्ते कि वह पढ़ाने और पत्रकारिता के बीच न झूल रहे होते, और उन्होंने चापलूसी की विधा में पी-एच. डी. की होती। चापलूसी के इस युग में, चापलूसी के हुनर में बेहद कमजोर होना ही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है। वह बहुत प्रयास करने के बावजूद चापलूसी के हर इम्तिहान में बुरी तरह से नाकाम रहे हैं, जिसका भारी खामियाजा उन्हें उठाना पड़ा है।

लेखक के इस सच पर सन्देह करने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता कि यदि पत्रकारिता में नौकरी की गारण्टी और समुचित वेतन सुनिश्चित होता तो उन्होंने पत्रकारिता नामक अपनी महबूबा को न छोड़ा होता, जिसकी टीस उनके दिल में आज भी बहुत गहरी बनी हुई है। उन्हीं के शब्दों में – ‘पत्रकार होने की अहमियत का अन्दाज उस वक्त नहीं लगता जब आप इस पेशे में होते हैं। जब आप इससे बाहर आते हैं, तो बहुत कुछ मिस करने लगते हैं। यह पेशा उस नकचढ़ी प्रेमिका की तरह है, जो मिलने पर बुरी लगती और दूर जाते ही उसकी याद तड़पाने लगती है। खूब ! बहुत खूब डॉ. सुशील कुमार उपाध्याय जी महाराज !!

यदि आपके पास भी मीडिया जगत से संबंधित कोई समाचार या फिर आलेख हो तो हमें jansattaexp@gmail.com पर य़ा फिर फोन नंबर 9650258033 पर बता सकते हैं। हम आपकी पहचान हमेशा गुप्त रखेंगे। - संपादक

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