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पत्रकारीय-आजादी का सवाल-1

Sushil Upadhyay ! किसी भी पत्रकार के लिए सबसे बड़ी पूंजी यह होती है कि लोग उस पर भरोसा करें। इसके साथ जुड़ी दूसरी बात यह है कि पत्रकार जिस संस्थान में
पत्रकारीय-आजादी का सवाल-1

Sushil Upadhyay ! किसी भी पत्रकार के लिए सबसे बड़ी पूंजी यह होती है कि लोग उस पर भरोसा करें। इसके साथ जुड़ी दूसरी बात यह है कि पत्रकार जिस संस्थान में कार्यरत है, वह संस्थान उस पर भरोसा करे। पत्रकारिता में भरोसे की जितनी अधिक महत्ता है, यह उतनी आसानी से हासिल नहीं होता है। पत्रकार हर वक्त सवालियाा निशान के दायरे में रहता है। पत्रकार को एक साथ कई चीजांे के लिए संघर्ष करना होता है। इन चीजों में से एक है-आजादी। काम करने की आजादी, लिखने की आजादी, मुद्दांे को उठाने की आजादी, अपनी बात को प्रस्तुत करने की आजादी...........। जैसे भरोसा आसानी से हासिल नहीं होता, वैसे ही आजादी भी आसानी से हासिल नहीं होती। इसकी राह में कई बड़ी चुनौतियां खड़ी होती हैं। पत्रकार की आजादी काफी हद तक उसके संस्थान की नीतियों से भी प्रभावित होती हैं।
पत्रकारिता में आजादी के दोनों रूप दिखाई दे सकते हैं। जो हमे बाहर से आजादी दिख रही है, वह आभासी भी हो सकती है। इस आजादी के पैरों में कइ बार वित्तीय हितों की बेड़ी पड़ी होती है। यदि, किसी मीडिया संस्थान की रीति-नीति कुछ खास हितों पर आधारित है तो फिर संबंधित संस्थान में वास्तविक आजादी की उम्मीद करना बेमानी ही होगा। कोई भी संस्थान अपने पत्रकारों को कभी यह नहीं कहता कि उसके यहां काम करने की आजादी नहीं है। हर संस्थान आजादी का ढिंढोरा पीटता है, लेकिन कुछ ही वक्त में कोई न कोई ऐसी बात सामने आ सकती है, जिसमें आपको दिखाई देगा कि संस्थान द्वारा किसी खास बात, मुद्दे या प्राॅडक्ट को बढ़ावा दिया जा रहा है। ऐसे मामलों में खुले तौर पर कभी कोई निर्देश नहीं दिया जाता। इस प्रकार मान सकते हैं कि यह पत्रकार की आजादी पर छिपा हुआ हमला है। प्राॅडक्ट का अर्थ किसी भौतिक वस्तु से ही नहीं है। यह वैचारिक भी हो सकता है। संभव है कि कोई संस्थान किसी विचार-विशेष को बढ़ाने में रुचि रखता हो, लेकिन एक पत्रकार के तौर पर आप पाते हैं कि ऐसा करना पत्रकारीय आजादी के खिलाफ है।
हम अपने आसपास ऐसे लोगों को देखते हैं जो पत्रकारिता करने के साथ-साथ अन्य आर्थिक गतिविधियों में लिप्त हैं। ऐसे लोगों से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे अपने वित्तीय हितों को पीछे करके केवल और केवल पत्रकारीय आजादी के लिए कार्य करेंगे। ऐसे लोगों में वे भी शामिल हैं, जो समानांतर तौर पर मीडिया से इतर किसी संस्था में नौकरी करते हैं। जब कभी कोई ऐसा मामला आएगा, जिसमें उनकी नौकरीदाता संस्था का नाम जुड़ा हो तो उनके लिए यह संभव नहीं होगा कि वे अपनी नौकरी दांव पर लगाकर पत्रकारीय मूल्यों के लिए काम करें। इन तमाम बातों को सामने देख सकते हैं कि पत्रकारीय आजादी बड़ी हद तक मीडिया घरानों की नीतियों पर निर्भर करती है। हालांकि, इसका एक अंश पत्रकार से भी जुड़ा है, लेकिन वह मीडिया मालिकान जितना प्रभावपूर्ण नहीं है। पत्रकार के लिए यह बात बेहद कीमती है कि वह न केवल आजाद हो, वरन आजाद दिखे भी। और यदि वह आजाद दिख रहा है तो अपनी आजादी का इस्तेमाल करना भी आना चाहिए। भले ही पत्रकार यह सोचता हो कि वह आजादी से काम कर रहा है, लेकिन लोगों को उसकी आजादी और आजादी से काम करने की योग्यता पर शक है तो फिर उसका अच्छे से अच्छा काम भी बेमतलब हो जाएगा।
इस संदर्भ में एक और रोचक बात ध्यान देने लायक है, वह यह कि पत्रकारों को इस भ्रम में जीना सिखाया जाता है कि वे हर तरह से आजाद हैं और कोई भी न तो उनकी आजादी को छीन सकता है और न ही उन्हें अपने मूल्यों-मानकों के विपरीत कार्य करने के लिए बाध्य कर सकता है। इस सोच के चलते कई बार उन्हें खुद भी अंदाज नहीं होता कि पत्रकारीय आजादी उनसे कोसों दूर है। आजाद पत्रकार की बजाय वे एक टूल की तरह काम कर रहे होते हैं और प्रायः अपनी वर्तमान स्थिति से संतुष्ट भी होते हैं। सार्वजनिक तौर पर वे यह भी कहते दिख सकते हैं कि न तो वे किसी डरते और न ही खबरों के लिए कोई लाभ स्वीकार करते। इसी समान वक्त में किसी भी पत्रकार को यह कहते सुना जा सकता है कि आज के दौर में ज्यादातर पत्रकार ब्लैकमेलर हैं और पत्रकारिता को पैसा उगाहने का धंधा बना चुके हैं। इन दोनों बातों को एक साथ रखकर देखिए तो स्पष्ट होगा कि कोई भी पत्रकार केवल अपनी निगाह में आजाद है, दूसरे की निगाह में वह अपनी आजादी को गिरवी रख चुका है।
असल में, ज्यादातर पत्रकार खुद को मूल्यों-आदर्शाें की पत्रकारिता करने वाला समझता है, जबकि दूसरे पत्रकारों के बारे में वह पूर्व-धारणाओं और आग्रहों के आधार पर काम करता है। जबकि, सच्चाई यह है कि पत्रकार की आजादी का वास्तविक मूल्यांकन उसके पाठकों-दर्शकों द्वारा ही किया जा सकता है। हम सभी लोग टीवी पर अनेक पत्रकारों को देखते-सुनते हैं, लेकिन उनमें से कम ही लोगों को आजाद-पत्रकार के तौर पर देखते और स्वीकार करते हैं। ऐसा नहीं है कि हमें उन पत्रकारों में किसी व्यक्ति या संस्था ने जानकारी उपलब्ध कराई हो, बल्कि एक पाठक या दर्शक के तौर पर हम आसानी से समझ जाते हैं कि किसी पत्रकार की लाइन एंड लैंथ क्या और उसकी बातों के पीछे छिपी हुई मंशा क्या है।

यदि आपके पास भी मीडिया जगत से संबंधित कोई समाचार या फिर आलेख हो तो हमें jansattaexp@gmail.com पर य़ा फिर फोन नंबर 9650258033 पर बता सकते हैं। हम आपकी पहचान हमेशा गुप्त रखेंगे। - संपादक

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